राष्ट्रवादी खासदार कोल्हेंच्या जबरदस्त अभिनयाने, धारदार शब्दफेकीने गांधींचा मारेकरी ‘नथुराम’ पडद्यावर जिवंत झाला…


विशेष प्रतिनिधी

मुंबई : प्रभावी शब्दफेक, भेदक नजर आणि करारी आवाजाच्या जोरावर राष्ट्रवादी कॉंग्रेसचे खासदार डॉ. अमोल कोल्हे यांनी नथुराम गोडसे पडद्यावर अक्षरशः जिवंत केला आहे. ओटीटी माध्यमातून नुकत्याच प्रदर्शित झालेल्या ‘व्हाय आय किल्ड गांधी’ या सिनेमात कोल्हे यांनी वादग्रस्त नथुराम गोडसेची भूमिका साकारली आहे. कोल्हेंनी तडफेने व ताकतीने नथुराम साकारला आहे. ‘Nathuram’ came alive with NCP MP Dr Amol Kolhe’s tremendous performance

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यांची हत्या करणाऱ्या नथुराम गोडसेचे न्यायालयातील स्वगत, वक्तव्ये आणि युक्तिवाद आपल्या धारदार शब्दफेकींनी कोल्हे यांनी सादर केला आहे. २०१७ मध्ये चित्रित केलेला हा लघुपट २०२२ मध्ये प्रदर्शित झाला. कोल्हे तेव्हा शिवसेनेत होते आणि ते आता राष्ट्रवादी काँग्रेसचे खासदार आहेत. त्यांनी केलेल्या या भूमिकेवरून जोरदार वादळ उठले आहे. राष्ट्रवादीच्या काही मंत्र्यांनी विरोध केला, काँग्रेसने तर बंदी घालण्याची मागणी केली; पण शरद पवा यांनी पाठराखण केल्यानंतर विरोध मावळला. त्यानंतर कोल्हे यांनी आळंदीत जाऊन महात्मा गांधीजींच्या पुतळ्यासमोर आत्मक्लेष देखील करवून घेतला आहे.



या सगळ्या पार्श्वभूमीवर कोल्हे यांनी नथुराम गोडसेचे वादग्रस्त पात्र जबरदस्त केले आहे. गांधीजींच्या हत्येचे समर्थन करणारे त्यांचे धारदार डायलाँग पुढीलप्रमाणे आहेत. ते हिंदीतून असल्याने हिंदी भाषेतच दिले आहेत :

  • गांधीजी एक हारा हुआ जुआरी था, मुसलमानों पर दांव पर दांव लगाते चले गए. भारत की राजनीति से गांधीजी के प्रस्थान सेही भारत का भाग्योदय होगा. महाशक्ति बनकर उभरेगा. नहीं तो यह देश पाकिस्तान के आधिपत्य में चला जाएगा. गांधीजीकी व्यक्तीगत महत्वाकांक्षा राष्ट्रहित पर इतनी भारी पडी की राष्ट्र के दो टुकड़े हो गए।
  • जिस तरह एक हारा हुआ जुआरी दांव पर दांव लगाया जाता है उसी तरह गांधीजी भी मुसलमानों पर दांव लगाते चले गए. केवळ इसी आशा में की वह एक दिन मुसलमानों का भी नेतृत्व कर सके इसी आशा में वह मुसलमानों की उचित और अनुचित मांगों को भी पूरी करने लगे. गांधीजी की इसी नीति से प्रेरित होकर द्वितीय विश्व युद्ध के शुरू होने से पहले एप्रिल १९४० में जिना ने दो राष्ट्रीय निर्माण की मांग की. अंग्रेजों का यह बात बहुत पसंद आई. १९४२ में कॉंग्रेसने गांधीजी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन किया. पर १९४५ में वे जर्मनी और जापान की हार के बाद अंग्रेजों से बात करने लगी. इस प्रक्रिया में कांग्रेस जिना की हिंसा की राजनीति के आगे झुकने को मजबूर हो गई. भारत का एक तिहाई हिस्सा भारत ही दुशमन बन गया. पश्चिमी पाकिस्तान में या तो हिंदू मार डाले गए या उनका सब कुछ नष्ट हो गया. पूर्व पाकिस्तान का यही हाल है.
  • यह रक्तपात शांति और अहिंसा की नीति पर चलने वाले उन्हीं गांधीजी के कारण हुआ उन्होंने अपने प्रत्येक भाषण और लेख में क्रांतिकारियों की निंदा की. गांधीजी के विरोध के बावजूद मार्च १९३० में कांग्रेस ने शहीद भगत सिंह की प्रशंसा का प्रस्ताव पारित किया तब गांधीजी अपनी इस पराजय को नहीं भूले. मुंबई के गवर्नरपर गोली चली तो गांधीजी ने इसका कारण कांग्रेस के इस प्रस्ताव को बताया. सुभाष चंद्र बोस ने गांधींजींनी विरोध किया तो परिणामस्वरूप गांधीजी सुभाष चंद्र बोस को भी अपना शत्रु समझने लगे. उनका कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने पर गांधीजी ने कहा सुभाष की जीत गांधी की हार है. जब तक उनको कांग्रेस अध्यक्ष पद से नहीं उतारा गया उनका क्रोध शांत नहीं हुआ.
  • जो लोग कहते है मात्र गांधीजी के परिश्रम से हमें आजादी मिली वह एक झुठा इतिहास लिख रहे हैं. जब तक देशभक्त क्रांतिकारी के बलिदान को अंधेरे में रखा जाएगा तब तक हमारी आनेवाली पिढीयां इतिहास के सवेरे से वंचित रहेगी. हिंदू और मुसलमानों का नेता बनने के लिए गांधीजी ने किया था वह पाकिस्तान से बनती है निरस्त हो गया वह अनेक बार जीना से मिलने गए और सदा उन्हें जिन्ना भाई या कायदेआझम संबोधित किया. लेकिन एक भी ऐसा प्रसंग नहीं की उन्होंने उनकी बात मान ली. जब आध्यात्मिक शक्ति से जीना को नहीं मना सकते तो उन्हे किसी और नेता को जीना से निपटने का कार्य सौंपना चाहिए था. परंतु व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा राष्ट्रहित पर इतनी भारी पड़ी की राष्ट्र के दो टुकड़े हो गए. हमारे त्यागी और दूरदर्शी नेताओं ने संयुक्त राष्ट्रीय प्रयास विफल हुआ. विभाजित देश के लिए उन्होंने अपने जीवन दांव पर नहीं लगाए थे.
  • कुछ लोग कहते है की अगर पाकिस्तान नहीं बनता तो आजादी नहीं मिलती. मैं इस बात को नहीं मानता कांग्रेस ने अपने पाप को छुपाने के लिए यह बहाना बनाया है. करोडो हिन्दुओं को मुसलमानों की दया पर छोडकर गांधीजी कहते है हिंदुओं को पाकिस्तान से पलायन नहीं करना चाहिए. पाकिस्तान में हिंदू जाति और संस्कृति मिटाने के लिए जो अत्याचार हुआ है उसका मूल कारण गांधीजी है. अपने सत्य और अहिंसा के यश के लिए गांधीजी ने शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, गुरु गोविंद सिंह के मार्ग की आलोचना की.
  • गांधीजी के पूंजीपति मित्रों ने दूसरे महायुद्ध के ठेके लेके अपूर्व धन कमाया. बिरला, डालमिया, वालचंद हिराचंद को कौन नहीं जानता? गांधीजी से कोई व्यक्तिगत शत्रुत्व नहीं लेकिन पाकिस्तान निर्माण और उसके बाद घटी पाशवी घटनाओं के लिए वही जिम्मेदार दिखते है. इसलिए मैंने भारतीय राजनीति से गांधीजी को सदा के लिए हटाने का फैसला लिया. हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए अपना अनशन तोड़ने के लिए गांधीजी ने पहली शर्त रखी की दिल्ली की मस्जिदों में जो हिंदू शरणार्थी है उन्हे हटाया जाये. सरकार ने गांधीजी के सामने घुटने टेक दिए. उस दिन वर्षा हो रही थी. परंतु, उन निर्वासितों के कुटुंब बलपूर्वक हटाए गये. उन लोगों ने बिरला हाउस में जाके शरण की मांग की. लेकिन गांधीजी ने उनकी नहीं सुनी.

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