राज्य सरकार और पार्टी संगठन की लापरवाही और उदासीनता से किसान आंदोलन की आंच उत्तराखंड पहुंची

  • उत्तराखंड के किसानों की भागीदारी ने किसान आंदोलन में फूंकी जान

विशेष संवाददाता 

उत्तराखंड : राज्य की भाजपा सरकार और पार्टी संगठन की उदासीनता और लापरवाही से किसान आंदोलन की आंच पंजाब, हरियाणा के बाद उत्तराखंड पहुँच गई है। कुमाऊं क्षेत्र के उधम सिंह नगर जिले के लगभग चार से पांच हजार किसान दिल्ली में किसान आंदोलन में भाग ले रहे हैं। केवल संख्या ही नहीं राशन और संसाधनों की सप्लाई में भी उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के किसान पंजाब के किसानों के लिए उनका मनोबल बने हुए हैं। uttarakhand bjp government and party farmer agitation

ज्ञात हो कि प्रदेश के बड़े किसान-भू जोत के हिसाब से सबसे अधिक ऊधमसिंह नगर जिले में हैं। इनके पास औसतन 26 हेक्टेयर से अधिक जमीन है। इन किसानों में सबसे अधिक सिख बिरादरी के हैं। ये बाजपुर, रुद्रपुर, सितारगंज, किच्छा, जसपुर और काशीपुर जैसे क्षेत्रों में फैले हुए हैं। यहीं के संपन्न सिख किसानों ने न केवल किसान आंदोलन के लिए इस क्षेत्र के किसानों को लामबंद किया है बल्कि ये अब उत्तराखंड में भी धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं और आंदोलन को हवा दे रहे हैं।

उत्तराखंड में विगत कुछ दिनों में आंदोलन को लेकर ऐसी कई निंदनीय घटनाएं हुई हैं। नानकमत्ता- सितारगंज- किच्छा हाईवे पर पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ डाली गई। रोकने की कोशिश कर रहे पुलिस कर्मियों को ट्रैक्टर से कुचलने की कोशिश की गई। बाजपुर में मौजूद पुलिसकर्मियों के साथ धक्का-मुक्की और अभद्रता करने के साथ -साथ उन पर पथराव किया गया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बंशीधर भगत को काले झंडे दिखाए गए। दोराहा-यूपी बॉर्डर पर भी घटनाएं हुई। सिसईखेड़ा में कई पुलिसकर्मियों को चोट लगी. जसपुर और काशीपुर में भी ऐसी घटनाएं हुई। इसी ऊधमसिंह नगर में आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान का जबरदस्त स्वागत हुआ, उनके काफिले में दर्जनों कारें थी।


प्रशासन के नाम पर पूरे देश में फिसड्डी साबित हुआ उत्तराखंड


उत्तराखंड में भाजपा सरकार है लेकिन न तो भाजपा संगठन और न ही प्रदेश सरकार, इन घटनाओं को नियंत्रित करने में असफल हुई है। सरकार का खुफिया तंत्र पूरी तरह फेल रहा। सरकार कृषि सुधार कानूनों के फायदे को किसानों को समझाने में नाकाम रही। यदि सरकार और संगठन इन कानूनों के प्रावधानों को सही तरीके से जनता के समक्ष रखती तो इससे बचा जा सकता था। सरकार की ऊधमसिंह नगर की किसान रैली अव्यवस्था और किसानों के विरोध के कारण पूरी तरह असफल रही।

ध्यान देने वाली बात यह है कि सरकार यदि केवल उधम सिंह नगर जिले में भी फोकस करती तो किसान आंदोलन उत्तराखंड में न फैलता। प्रदेश की भाजपा सरकार और भाजपा संगठन की किसानों से संवादहीनता का फायदा अकाली दल और कांग्रेसियों ने अच्छे से भुनाया है और किसानों को को भड़काया है।

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जबकि अकाली दल कोटे के और भाजपा सिंबल पर चुनाव लड़ने वाले लगातार चौथी बार काशीपुर से विधायक हरभजन सिंह चीमा के तेवर किसानों के साथ हैं बेहतर होता सरकार चीमा को किसानों से संवाद की जिम्मेदारी देती राज्य सरकार द्वारा किसान संगठनों से बातचीत ना होना और प्रदेश भाजपा संगठन द्वारा कृषि कानूनों के संबंध में सरकार और संगठन के स्तर पर कोई रणनीति नहीं बनाई गई। उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी की प्रचंड बहुमत की सरकार है किंतु सरकार और संगठन के बीच की खाई के कारण किसान आंदोलन राज्य में ही मैनेज नहीं हो पाया और सैकड़ों किसान दिल्ली जा धमके। पंजाब और हरियाणा के बाद इतने बड़े पैमाने में उत्तराखंड में किसान आंदोलन की आग का भड़कना राज्य सरकार और भाजपा संगठन की नाकामी है।

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