समय आ गया है कि ट्विटर और फेसबुक को भारत प्रतिबंधित करे


विशेष संवाददाता

नई दिल्ली :  दुनिया में सूचना क्रांति को कई कदम आगे ले जाने में सोशल मीडिया (twitter and facebook)  का अहम योगदान है। सोशल मीडिया साइट्स फेसबुक और ट्विटर ने तो दुनिया भर में शोषित, कमजोर और दबे कुचले वर्ग को एक सशक्त माध्यम दिया है जिसके सहारे इन लोगों ने अपनी बात और विचार के साथ साथ मत को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रखा है। यही नहीं सोशल मीडिया के आगमन के बाद दुनिया को अपने कृत्रिम नैरेटिव पर टिका कर चलाने वाले उस एलीट वर्ग का भी पर्दाफ़ाश हुआ है जो दशकों से मुख्य धारा के माध्यमों ( टीवी और समाचार पत्रों) पर कब्ज़ा जमाए बैठे थे और अपने हिसाब से दुनिया को दुनिया दिखा रहे थे। यानि सिलेक्टिव तरीके से खबर का धंधा कर रहे थे। twitter and facebook

ये विशेष वर्ग जब चाहे जिसे चाहे हीरो बना रहा था और किसी भी व्यक्ति को ख़ूँख़ार दरिंदा साबित कर दे रहा था। करीब एक दशक तक सोशल मीडिया ने ऐसे तत्वों को समाज के सामने एक्सपोज़ किया और आम लोगों के हाथ में नैरेटिव को तय करने की ताकत दे दी। लेकिन अब जाहिर हो रहा है कि, वही मुख्यधारा पर कब्ज़ा जमाने वाला विशेष वर्ग अब सोशल मीडिया प्लेटफॉरर्म्स पर भी काबू पाने में काफी हद तक सफल भी हो रहा है। ट्विवटर इसका ताजा उदाहरण है। twitter and facebook

अमेरिकी चुनाव में जिस तरह से ट्विटर ने एक तरफा रुख अपनाया है उससे जाहिर हो गया है कि ट्विटर के प्रबंधन ने खुले तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति उम्मीदवार जो बाइडन की भरपूर मदद की है। ऐन मतदान से पहले ट्विटर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कई ट्वीट्स को बार बार न सिर्फ ब्लैक आउट किया बल्कि बाइडन के खिलाफ छपि खबरों के स्क्रीन शॉट्स और उनके लिंक को गायब कर दिया। इनमें जो बाइडन और उनके बेटे से जुड़े कई भ्रष्टाचार के मामलों की खबरें थीं। जाहिर है अमेरिकी चुनाव में डोनाल्ड ट्रम्प को हराने और बाइडन को मदद पहुंचाने की नियत से ट्वीटर ने ऐसा किया। लिहाजा ट्विंटर की निष्पक्षता अब संदेह के घेरे में है। twitter and facebook

वहीं, इससे पहले फेसबुक ने अपने प्लेटफॉर्म पर कथित अश्लीलता, हेट स्पीच और असंवेदनशीलता के लिए स्थापित मापदंडों के तहत नजर रखने के लिए स्वतंत्र ओवारसाइट बोर्ड का गठन किया था। इस बोर्ड में शामिल डेनमार्क के पूर्व पीएम हेले थोर्मिंग स्मिड्ट, काटालीना बोरेटो-मोरीनी, ऐफिया आलो असारे क्येई और सुधीर कृष्णास्वामी ऐसे नाम हैं जो सीधे तौर पर जोर्स सोरोस की संस्था से धन लेते आए हैं। अमेरिकी अरब पति जोर्ज सोरोस वही व्यक्ति है जिसने घोषणा की थी कि, वो नरेंद्र मोदी को हराने के लिए किसी भी भारतीय संगठन और व्यक्ति को हर संभव संसाधन देने के लिए तैयार है। ये चिंता की बात इसलिए है कि आजतक दुनिया में इस तरह की घोषणा, किसी देश के आंतरिक राजनीति को प्रभावित करने के लिए किसी ने सार्वजनिक रूप से नहीं की है। जॉर्ज सोरोस अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भी विरोधी है। लिहाजा फेसबुक की विश्वसनीयता भी अब संदेहास्पद है। आपको बता दें कि हाल में ही भारत में फेसबुक की वरिष्ठ अधिकारी अंखी दास को कांग्रेस के विरोध के बाद हटना पड़ा है।

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ये बात किसी से छिपी नहीं है कि, अमेरिकी कानून और अर्थव्यवस्था की ख़ामियों का लाभ लेते हुए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने अमेरिकी विश्वविद्यालयों में अपना दखल काफी बढ़ा लिया है। यही नहीं अमेरिका की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटी को अरब के देशों से भी भारी फंडिंग हो रही है। इसके अलावा अमेरिका के कई मीडिया संस्थानों में भी अरब देशों का पैसा लगा हुआ है। जिसका इस्तेमाल करने हुए चीन और कट्टर इस्लामिक प्रेशर ग्रुप्स न सिर्फ अमेरिकी राजनीति में गहरी पैठ बना चुके हैं बल्कि अमेरिका में नैरेटिव भी बदल रहे हैं। आज अमेरिकी राष्ट्रवाद को वहां ज़हरीली विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, लेकिन इस्लामिक देशों से शर्णार्थियों के रूप में आ रहे कट्टर आतंकियों के समर्थन में माहौल बनाया जा रहा है। ऐसा चलता रहा तो जाहिर है यूरोप की तरह ही जल्द ही अमेरिका में भी इसके दुष्परिणाम देखने को मिलेंगे।

भारत में भी ठीक इसी मॉडल में पिछले कई साल से विपक्षी राजनीति को बदलते हुए देखा जा रहा है। कांग्रेस पार्टी की चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ गुपचुप समझौते की बात हो या फिर भारत के प्रमुख मीडिया संस्थानों में चीन की सरकार द्वारा विज्ञापनों की शक्ल में करोड़ों रुपए की मदद या फिर जेएनयू जैसे शीर्ष संस्थानों में चीन और पाकिस्तान समर्थक तत्वों की उपस्थिती ही क्यों ना हो, ठीक उसी तरह भारत में विपक्ष की राजनीति को प्रभावित किया जा रहा है जैसे अमेरिकी में हुआ है। भारत में विपक्ष सरकार को घेरता आया है। सरका की नीतियों और फ़ैसलों की आलोचना भी करता आया है। लेकिन हाल फिलहाल कांग्रेस के नेताओं द्वारा जिस तरह से देश की सुरक्षा और संप्रभुता को किनारे रखकर दुश्मन देश की भाषा में बाते कहीं गई वो किसी भी देशवासी के गले नहीं उतरी हैं। पाकिस्तान कई मौका पर आधिकारिक रूप से कांग्रेस पार्टी और कुछ दूसरे राजनीतिक दलों के नेताओं के बयानों का सहारा लेकर भारत को दुनियाभर में अपमानित भी कर चुका है।

लिहाजा समय आ गया है कि भारत सरकार सुनिश्चित करें कि देश की आतंरिक राजनीति और व्यवस्था को विदेशी तत्व प्रभावित ना कर सकें। विशेष कर सोशल मीडिया माध्यमों पर काबू रखने की आवश्यकता बढ़ गई है। पाकिस्तान और चीन कई मौको पर रातों रात भारत में ट्विटर और फेसबुक के सहारे गलत और भ्रामक पोस्ट वायरल कर देश के आंतरिक माहौल को खराब करने की कोशिशें कर चुके हैं। अमेरिकी चुनाव को ही यदि मिसाल बनाकर देखा जाए तो समय आ गया है कि ट्विटर और फेसबुक को भारत में उस वक्त तक प्रतिबंधित कर देना चाहिए, जबतक ये सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भारत में ही अपने सर्वर ना लगा लें।

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