जिहादी-नक्सलियों की ब्लैकमेलिंग पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, कहा- शाहीनबाग़ जैसेप्रदर्शनों को इजाज़त नहीं

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली : देश के युवाओं, किसानों और अल्पसंख्यकों को हिंसक प्रदर्शनों के साथ साथ सार्वजनिक स्थानों पर कब्ज़ा कर धरना देने कीजिहादी-नक्सलियों की ब्लैकमेलिंग की सियासत को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए बेहद कड़े लहजे में स्पष्ट किया है कि लोकतांत्रिक भारत में विरोध के नाम पर जनता को असुविधा नहीं पहुँचाई जा सकती है और ना ही पब्लिक स्थानों पर कब्ज़ा जमाया जा सकता है। दिल्ली के शाहीनबाग पर 100दिनों तक चले धरने के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाते हुए उच्चतम अदालत ने ये टिप्पणियां की हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को शाहीनबाग मामले में कठोर टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई भी समूह या व्यक्ति सिर्फ विरोध प्रदर्शनों के नाम पर शाहीनबाग जैसी सार्वजनिक जगहों कोअनिश्चित काल तक ब्लॉक या उसपर कब्ज़ा नहीं जमा सकता है। कोर्ट ने अपने फैसले मेंकहा कि, पब्लिक प्लेस पर अनिश्चितकाल के लिए कब्ज़ा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है लेकिन अंग्रेजों के राज के दौरान की जाने वाली हरकतें अब लोकतंत्र में करना सही नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सभी पक्षों को याद दिलाया कि, शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार प्रत्येक नागरिक का एक संवैधानिक अधिकार है और इसका सम्मान किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि, अधिकार का मतलब यह नहीं है कि, वर्तमान में आंदोलन करने वाले लोग आजादी के लिए किए गए संघर्ष के दौरान अंग्रेजी राज के खिलाफ इस्तेमाल किए गए विरोध के साधनों और तरीकों को अपनाएं।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एसके कौल, अनिरुद्ध बोस और कृष्णमुरारी की बेंच द्वारा यह फैसला दिया गया है। कोर्ट ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के लिए सार्वजनिक स्थान पर इस तरह का कब्ज़ा स्वीकार्य नहीं है और निर्धारित स्थानों पर ही विरोध प्रदर्शन होना चाहिए।

कोर्ट ने कहा, “शाहीन बाग इलाके से लोगों को हटाने के लिए दिल्ली पुलिस को कार्रवाई करनी चाहिए थी। विरोध प्रदर्शनों के लिए शाहीन बाग जैसे सार्वजनिक स्थलों पर कब्जा करना स्वीकार्य नहीं है। प्रशासन को खुद कार्रवाई करनी होगी और वे अदालतों के पीछे छिपनहीं सकते। लोकतंत्र और असहमति साथ-साथ चलते हैं। लेकिन विरोध प्रदर्शन के लिए निर्धारित जगह होनी चाहिए” ।

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस ममले में 21 सितंबर को अपना आदेश सुरक्षित रखा था। अधिवक्ता अमित साहनी ने जनवरी में शाहीनबाग़पर हुए विरोध प्रदर्शन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने शिकायत की थी कि शाहीनबाग के प्रदर्शनकारियों ने विरोध के नाम पर मुख्य सड़क को ब्लॉक किया था, जिससे आम लोगों के मुक्त आवागमन के अधिकार का हनन हुआ था।

ग़ौरतलब है कि कोरोना वायरस के मद्देनज़र लॉकडाउन लागू होने के बाद शाहीनबाग की सड़क से प्रदर्शकारियोंको हटा दिया गया था। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो ‘विरोध के अधिकार बनाम मुक्त आवागमन के अधिकार’ के मुद्दे पर फैसला सुनाएगी।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आज के आदेश से सरकारों को अदालती आदेश की प्रतीक्षा किए बिना सार्वजनिक स्थानों पर विरोध प्रदर्शनों को हटाने की कानूनी मंजूरी मिल गई है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर काफी दूर तक देखा जाएगा और देश में विरोध प्रदर्शनों के तौर तरीके भी बदल जाएंगे।

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