देश में मीडिया नेरेटिव कब्जाने की छटपटाहट में है कांग्रेस

विशेष संवाददाता 

नई दिल्ली : कांग्रेस पार्टी की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके पुत्र राहुल गांधी को लगता है कि वे अब भी केंद्र की सत्ता पर काबिज़ हैं। यही कारण है कि वे लोकतांत्रिक भारत के उन प्रतिष्ठानों पर आए दिन सस्ती टिप्पणियां और आरोप लगाते हैं ताकि वे खुद के महत्व को जता सकें। ये और बात है कि गांधी खानदान की विश्वसनियता आज शून्य है। हाल के दिनों में गांधी खानदान के निशाने पर मीडिया आया है।

सोनिया ने जहां एक लेख में ये साबित करने की कोशिश की है कि देश में बोलने की आजादी पर केंद्र की मोदी सरकार पाबंदी लगा रही है तो वहीं राहुल गांधी ने अमेरिका के एक वामपंथी अखबार के हवाले से कहा कि सोशल मीडिया साइट फेसबुक बीजेपी और आरएसएस के अधीन हो गई है।

गांधी परिवार की तरफ से आई ये तल्ख टिप्पणियां विडंबना से भरी हुई हैं। सोनिया गांधी क्यों भूल जाती हैं कि उनके शाषन वाले राज्यों में हाल के दिनों में पत्रकारों और समाजसेवियों पर सबसे ज्यादा अत्याचार हुआ है। ताजा उदाहरण रिपब्लिक टीवी के प्रख्यात एंकर अर्नब गोस्वामी का ही ले लीजिए। मुंबई में गोस्वामी को इसलिए घंटों तक पुलिस थाने में बैठना पड़ा क्योंकि उन्होंने अपने टीवी कार्यक्रम में सोनिया गांधी का असली नाम (एंटोनियो मायनों) ले लिया था। यही नहीं इसी नाम का उच्चारण करने के लिए बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा पर कांग्रेस पार्टी के कहने पर देशभर में कई सौ एफआईआर दर्ज करा दी गई थीं।

गांधी परिवार की राजनीतिक सूझबूझ पर भी सवाल उठने लग गए हैं। आखिर जो पार्टी खुद सोशल मीडिया साइट फेसबुक को संगिद्ध कंपनियों से डेटा मैनिपुलेशन कराकर प्रभावित करती हुई पकड़ी गई हो, वो अब उसी फेसबुक पर पक्षपात का आरोप लगाकर अपनी जंगहंसाई कर रहे हैं। राहुल गांधी के फेसबुक पर पक्षपात करने के आरोप पर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जो लोग अपनी ही पार्टी के भीतर नेताओँ को प्रभावित नहीं कर प रहे हैं वो बीजेपी और आरएसएस पर दुनिया को प्रभावित करने क आरोप लगा रहे हैं।

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि कैंब्रिंज एनालिटिका और फेसबुक की मदद से लोकसभा चुनाव के ठीक पहले कांग्रेस पार्टी डेटा मैनिपुलेशन से मतदाताओँ को प्रभावित करनी हुई पकड़ी गई थी। प्रसाद ने कहा कि आज देश में सूचना तक आम लोगों की पहुंच आसान है और अभिव्यक्ति की आजादी सभी के लिए हैं। कांग्रेस पार्टी और उनके वामपंथी चाटूकारों का मीडिया नैरेटिव में एकाधिकार नहीं रहा है इसीलिए ये व्यथित हैं।

एक के बाद एक ऐसे प्रकरण सामने आए हैं जिससे जाहिर होता है कि देश का पुरातन लिबरल तंत्र बुरी तरह हताश है। अबतक ये तंत्र देश में सूचना प्रसारण और मीडिया नैरेटिव के स्वयंभू रक्षक बनकर विरोधी स्वरों को सेंसरशिप कर अपना सिक्का चलाते थे। लेकिन अब ये एकाधिकार समाप्त हो रहा है। हालाँकि अब भी विश्विद्यालयों और शिक्षाविदों के बीच इनका नियंत्रण कमजोर नहीं हुआ है।

फेसबुक, यूट्यूब, ट्विटर और व्हाट्सएप के साथ सा सस्ते स्मार्टफोन और तेज मोबाइल डेटा की उपलब्धता ने आम लोगों के हाथों में मीडिया नैरेटिव को ला दिया है। या यूं कहे कि आज वास्तम में भारत का मीडिया नैरेटिव लोकतांत्रिक हो गया है। मुख्यधारा की मीडिया का पक्षपाती सेंसरशिप और गेट-कीपिंग समाप्त हो गया है और वैकल्पिक आवाज और राय को सोशल मीडिया के रूप में न सिर्फ माध्यमम मिला है बल्कि करोड़ों नए दर्शक भी मिले हैं।

इंटरनेट के प्रसार के साथ जिस तेजी से ये बदलाव भारत में हुए हैं उसे वामी-कांगी लिबरल तंत्र ने अनदेखा कर दिया। लेकिन इन माध्यमों की ताकत को समझते ही ये फिर से हावी होने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस और गांधी परिवार इसी कड़ी में सोशल मीडिया माध्यमों को अपनी अधीन लाने के लिए छटपटा रहे हैं। इसीलिए कभी तथाकथित ‘हेट स्पीच’ या सोशल मीडिया को ‘सुरक्षित स्थान बनाने’ के नाम पर ये लिबरल गैंग सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मस पर भी सेंसरशिप और गेट-कीपिंग की ताकत पाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं।

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