उत्तराखंड में गैर पहाड़ी ही है ‘चैम्पियन’

विशेष संवाददाता 

देहरादून : करीब 13 महीनों के निष्कासन बाद उत्तराखंड बीजेपी ने खानपुर के विवादित विधायक प्रणव सिंह चैम्पियन को माफ कर दोबारा से पार्टी में शामिल कर लिया है। पार्टी से जुड़े जानकार इसे बीजेपी नेतृत्व की राजनीतिक सूझबूझ बताकर मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष बंशीधर भगत की पीठ थपथपा रहे हों, लेकिन उत्तराखंड के आम जनमानस के लिए बीजेपी नेतृत्व का ये कदम किसी गहर धोखे से कम नहीं है।

चैम्पियन की गलती ये नहीं थी कि वो दिल्ली के उत्तराखंड सदन में दारू पार्टी कर हथियार लहरा रहा था। आम पहाड़ी इसे माफ कर भी सकता था, लेकिन सत्ता के गुरुर में चूर चैम्पियन ने जिस संज्ञा(गाली) का इस्तेमाल गरीब और पिछड़े उत्तराखंडियों के लिए किया था वो किसी भी सूरत में माफी के लायक नहीं था।

आम पहाड़ी जो पहले ही हिन्दुत्व की भांग चबा कर मदमस्त हो चुका था, वो इस खुश मिजाज़ी में था कि राज्य और केंद्र की सत्ता की चाबी बीजेपी के हाथों में देकर वो चैन से सो सकता है, क्योंकि उसे बहलाया गया कि उनके मसीहा उनके सेवादार बन गए हैं, जो उनकी शिक्षा, रोजगार के साथ साथ मान सम्मान की भी रक्षा करेगे।


लेकिन नेता तो नेता ही ठहरे, सो विकास के नाम पर राज्य सरकार केंद्र की मोदी सरकार के क्रेडिट कार्ड को खूब खर्च करती रही और जनता का नशा बढ़ाती रही। लेकिन जब सवाल आया उत्तराखंड की अस्मिता का, उसके नागरिकों के सम्मान का, तो बीजेपी के इन तथाकथित पहाड़ी नेताओं ने ही पहाड़ियों की पीठ में छुर्रा घोंप दिया है।

प्रणव सिंह चैम्पियन गैर पहाड़ियों के उस वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो भले राज्य में अल्पसंख्यक हो, लेकिन सत्ता को पिछले दरवाजे से वो ही हांकते हैं। उत्तराखंड के तराई के इलाकों में चलने वाले वैध और अवैध दोनों ही तरह के तमाम खनन पट्टे, चीनी मिल, शराब का कारोबार, प्रोपर्टी डीलींग या फिर दूसरे बड़े कारोबार हों, सभी पर गैर पहाड़ियों को बोलबाला है। ऐसे में इस वर्ग को साध कर ही ज्यादातर राजनीतिक दल सत्ता की दहलीज़ तक पहुंते हैं। क्योंकि चुनाव जीतने के लिए धन की आवश्यक्ता होती ही है। इस हिसाब से उत्तराखंड नाम से राज्य तो अस्तितव में आ गया है, लेकिन वास्तव में इस राज्य में पहाड़ियों का दखल ना के बराबर है।

प्रणव सिंह चैम्पियन का इतिहास ही गुंडागर्दी और लूट खसौट का रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स को देखें तो पता चलता है कि इससे पहले भी चैंपियन कई गंभीर आपराध कृत्य कर चुके हैं। 2006 में चैम्पियन ने हरिद्वार के नजदीक  बहादराबाद में रोडवेज बस के ड्राइवर पर फायरिंग कर दी थी। ड्राइवर का अपराध ये था कि उसने चैम्पियन के काफिले को साइड नहीं दी थी, 2010 में कर्नाटक के मंगलौर में एक कार्यक्रम के दौरान फायरिंग करते हुए चैम्पियन का वीडियो वायरल हुआ था, 2010 में ही रूड़की में एक होटल मालिक पर गोली चलाने का भी आरोप प्रणव चैंपियन पर लगा था। 2013 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के एक कैबिनेट मंत्री की डिनर पार्टी में भी चैम्पियन ने गोली चलाई थी। इसी तरह 2015 में हरिद्वार के पथरी में खनन को लेकर ग्रामीणों पर गोलियां चलाने का भी उन आरोप लगा था।

पृथक राज्य की मांग को लेकर दशकों तक चले आंदोलन के बाद साल 2001 में उत्तराखंड अस्तित्व में आया था। ऐसा नहीं था कि संयुक्त उत्तराखंड में उत्तराखंडियों के पास रोजगार या शिक्षा के मौके नहीं थे। ऐसा नहीं होता तो गोविंद वल्लभ पंत, हेमवति नंदन बहुगुणा,  नारायण दत्त तिवारी और मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता राष्ट्रीय राजनति के शीर्ष पर ना आ पाते। संयुक्त उत्तर प्रदेश में शिक्षा और रोजगार के मौके तो थे, लेकिन कुमांऊ-गढ़वाल की अलग और पुरातन सांस्कृतिक पहचान वहां खो सी गई थी। इसीलिए पृथक राज्य की मांग को लेकर चले आंदोलन के बाद उत्तराखंड की स्थापना संभव हुई।

ऐसे में वर्तमान सत्ताधारियों को याद कर लेना चाहिए कि आंदोलनों और आहुतियों से मिले उत्तराखंड के सम्मान के लिए जनता सदैव तत्पर रहती है। भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को अब चैम्पियन को लेकर राज्य के कुछ ढीले-ढाले नेताओं के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि जिस तरह से राज्य आंदोलनकारियों पर गोली चलवाने वाले तत्कालीन यूपी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को आज तक उत्तराखंड की जनता माफ नहीं कर सकी है, उसी तरह प्रणव सिंह चैम्पियन को माफ करने का अधिकार बीजेपी के राज्य नेतृत्व को नहीं है। क्योंकि चैम्पियन ने उत्तराखंड का अपमान किया है इसलिए उसे माफ करने का अधिकार भी राज्य की जनता के पास है।

    Leave Your Comment

    Your email address will not be published.*