अभिव्यक्ति की आज़ादी जिहादी, वामपंथी तंत्र की बपौती नहीं

विशेष संवाददाता 

नई दिल्ली : बोलने की आज़ादी क्या सिर्फ दिल्ली के खान मार्केट में दलाली चलाने वाले गैंग और लुटियन्स बंगलों के गलियारों में बैठने वालों के लिए ही है? क्या अपना मत जाहिर करने का अधिकार सिर्फ जेएनयू के नक्सली छात्रों और जामिया के जिहाद सनर्थक प्रोफेसरों के पास है? ये सवाल इस लिए उठते हैं क्योंकि जब एक मामूली सा टीवी चैनल नक्सली और जिहादी तंत्र की पोल खोलने की कोशिश करता है तो उसे रोकने के लिए चन्द घण्टों में सोशल मीडिया कैम्पेन खड़े हो जाते हैं और दिल्ली हाई कोर्ट में अर्ज़ियाँ लग जाती हैं।

 

मामला सुदर्शन न्यूज के एक प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर उठे विवाद का है। चैनल के संपादक सुरेश चव्हाणके ने ट्विटर पर एक प्रोमो वीडियो डाल कर दावा किया था कि यूपीएससी में मुस्लिम प्रत्याशियों के चयन को सुनिश्चित कराने के लिए जिहादी तत्व सक्रिय हैं। उन्होंने इसे यूपीएससी जिहाद का नाम दिया था। इसके बाद सोशल मीडिया साइट्स ओर चव्हाणके का जमकर विरोध हुआ लेकिन उनके समर्थन में भी हैशटैग चला। यहां तक तो बात ठीक थी, लेकिन अचानक से शाम होते होते ये खबर मीडिया सुर्खियों में बनने लगी कि दिल्ली हाई कोर्ट ने जामिया मिलिया इस्लामिया के कथित छात्रों की अपील पर सुदर्शन न्यूज के प्रस्तावित कार्यक्रम पर स्टे लगा दिया है।

 

जाहिर है भारत में अभिव्यक्ति की आज़ादी का अधिकार प्रत्येक नागरिक के पास है। ऐसे में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है, फिर चाहे वो किसी को अच्छी लगे या बुरी। भारत में मानहानि करने पर कानून में सजा का भी प्रावधान है। ऐसे में बोलने वाले को ही खुद तय करना होता है कि उसे बोलना है या नहीं। वहीं सुदर्शन न्यूज मामले में सिर्फ प्रोमो देखकर है तौबा मचाने वालों ने कार्यक्रम के प्रसारित होने का भी इंतज़ार नहीं किया और अदालत से सटे लगवा दिया। जाहिर है यहां कुछ लोगों ने साजिशन विरोधी स्वर को दबाने की मंशा से ऐसा किया गया है।

 

विरोधियों के विचारों को प्रतिबंधित करने की ये पहली कोशिश नहीं है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर लिखी किताब को भी विमोचन होने से ऐन पहले ब्लूम्सबरी प्रकाशन द्वारा हटा लिया गया था। बताया गया कि चन्द वामपंथी लेखकों और इतिहासकारों के दबाव में ब्लूम्सबरी ने ऐसा किया था।

 

इन दोनों घटनाओं ने वामपंथियों और जिहादी, लिबरल गैंग के दोहरे चरित्र को सबके सामने लाकर रख दिया है। ये संविधान में मिले तमाम अधिकारों को खुद अपने फायदे या विचारों के प्रस्तुतिकरण के लिए तो चाहते हैं, लेकिन अपने विरोधियों के लिए नहीं चाहते। वे अपने विरोधियों को रोकने के लिए या यूं कहें कि उनके अधिकारों के हनन के लिए अदालत से लेकर हिंसा तक सब हथकंडे अपनाते हैं।

    Leave Your Comment

    Your email address will not be published.*