बिहार का चुनावी मैच जीतने के लिए हाथरस में जाति संघर्ष पैदा कर रहा है कांग्रेसी मीडिया

विशेष संवाददाता

नई दिल्लीः बिहार का चुनाव सिर पर है और पहले की तरह ही इस बार भी कांग्रेस और उसके समर्थक दलों को चुनाव में जाने से पहले जाति संघर्ष को मुद्दा बनाना है। बार बार लांच किए गए राहुल और प्रियंका को फिर से लांच करने के लिए गांधी परिवार और उसका दलाल मीडिया गिरोह(‘दलाल मीडिया’ वो वर्ग है जो कांग्रेस के लिए नैरेटिव गढ़ता है) हाथरस की मृतक बिटिया को औज़ार बना कर सियासी तूफान खड़ा करने की फ़िराक़ में है।

गांधी खानदान का ‘दलित प्रेम’ उतना ही सच्चा है जितना गांधी परिवार के नेतृत्व वाली सरकारें ईमानदार रही हैं। लेकिन इस बार हाथरस को सुनहरा मौका देखने वाला गांधी परिवार बिहार चुनाव में जीत हासिल करने का सपना संजो रहा है। सपना देखना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन खतरनाक बात ये है कि गांधी परिवार के इस सपने को सच साबित करने के लिए हाथरस की घिनोनी घटना को मोहरा बनाकर कांग्रेस पार्टी और उसका दलाल मीडिया गहरी साजिश रच रहा है। ऐसा हम नहीं कह रहे हैं बल्कि हाल फिलहाल मीडिया में छापी गईं ख़बरें और टीवी पर दिखाए गए वीडियो, ऑडियो और बहस के कार्यक्रमों को देखकर पता चलता है।

हाथरस की घिनौनी घटना को लेकर गांधी परिवार के युवराज औऱ राजकुमारी के लिए मुख्य धारा की मीडिया के वर्ग द्वारा की गई रिपोर्टिंग कई सवाल पैदा करती है। उदाहरण के लिए इंडिया टूडे को लें तो, इनकी रिपोर्टिंग से न सिर्फ सन्देह पैदा होता है, बल्कि वे पत्रकारिता के सिद्धांतों को भी अंगूठा दिखाते नजर आते है।

इंडिया टुडे ने पहले तो एक खबर में राहुल-प्रियंका के हाथरस जाने की कोशिश को इंदिरा गाँधी की 1977 के बेल्ची दलित नरसंहार के बाद दिए भाषण के क्रम में सियासी वापसी से कर दी, फिर प्रियंका का दिल्ली के वाल्मीकि मंदिर में प्रार्थना करने को ‘मास्टरस्ट्रोक’ बता दिया। यही नहीं हाथरस में पीड़ित परिवार को इंडिया टूडे की एक संदेहास्पद रिपोर्टर द्वारा प्रियंका गांधी के आने तक सरकार के साथ कोई समझौता न करने की पाठ पढ़ाने और उन्हें ये कहकर डराना कि सरकार पीड़ित परिवार पर ही मृतका की हत्या का दोष मढ़ देगा, कई गंभीर सवाल खड़े करता है।

वहीं, तख्तापलट की फर्जी खबर छापने से सुर्खियों में आए शेखर गुप्ता की ‘द प्रिंट’ ने बीजेपी नेताओं के हवाले से फर्जी दावा किया है कि जिस तरह से उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का हाथरस मामले में रवैया रहा है, इससे डर है कि बिहार में बीजेपी के प्रदर्शन पर प्रभाव पड़ सकता हैं। इसके लिए शेखर गुप्ता की वेबसाइट ने एक बिना नाम के नेता का हवाला दिया।

मीडिया के एक वर्ग में ऐसे कई और खबरे छपी हैं जहां हाथरस की घटना को सीधे सीधे बिहार चुनाव से जोड़ा जा रहा है। मसलन ‘मनी कण्ट्रोल’ लिखता है कि चुनाव से पहले बिहार में हाथरस मुद्दे को लेकर आक्रोश है और बिहार के 243 में से उन 38 सीटों पर एनडीए को परेशानी हो सकती है, जो दलितों के लिए आरक्षित हैं। इसमें तेजस्वी यादव के बयान का जिक्र है, जिन्होंने मोदी सरकार के ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ अभियान पर तंज कसते हुए बीजेपी को दलित-विरोधी और महिला-विरोधी पार्टी बताया।

इसी तरह ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ भी लिखता है कि बिहार में बीजेपी के दलित नेता हाथरस मामले के उठने के बाद डरे हुए हैं। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री संजय पासवान का बयान है, जिन्होंने कहा है कि पीएम मोदी ने सीएम योगी को इस मामले में सख्त कार्रवाई करने की बात कह के अपना काम कर दिया है। उनका कहना है कि हाथरस मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है और स्पष्ट है कि इसमें मीडिया ट्रायल चल रहा है।

लेकिन बिहार चुनाव की हकीकत कुछ और ही है। बिहार में एनडीए की स्थिती पहले से और ज्यादा मजबूत हो गई है। बिहार के गया से सांसद रहे और महादलित समाज के नेता हरि माँझी ने सोशल मीडिया का सहारा लेकर गांधी परिवार पर निशाना साधा है और उनके हाथरस जाने के क्रम को एक्टिंग करार दिया। वो राहुल-प्रियंका को ‘पप्पू-पिंकी’ कहते हैं।

मांझी ने सोशल मीडिया पर अखबारों की कतरन लगाकर बताया कि पिछले एक महीने में नाबालिगों के साथ हैवानियत की 12 घटनाएं हुई जिसमें सभी आरोपी मुस्लिम थे। हरि माँझी ने पूछा कि दलितों के ठेकेदार इन ख़बरों पर क्यूँ नहीं बोलते? मायावती से लेकर रावण, उदित राज तक सब चुप हैं। उन्होंने कहा कि इन पर बोलने से इनका राजनीतिक करियर और खोखला सेक्युलरिज़म ख़तरे में आ जाएगा। बिहार चुनाव पर उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस के लोग अभी और खिसियाएँगे, क्योंकि आगामी बिहार चुनाव में उन्हें नील बटे सन्नाटा मिलेगा।

बता दें कि बिहार के तीन बड़े दलित नेताओं का एनडीए के पाले में आना विपक्षी पार्टियों को अखर रहा है। रामविलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान के अलावा महादलित समुदाय के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माँझी और अशोक चौधरी के एक साथ एनडीए में आने से न सिर्फ एनडीए मजबूत हुआ है बल्कि बिहार का 16 फीसदी दलित वोट भी एकजुट होने की संभावना बढ़ गई है।

यहां ये याद करना जरूरी है कि पिछले बिहार विधानसभा चुनाव यानि 2015 के चुनाव में कांग्रेस-राजद और उसके कुनबे ने बीजेपी को घेरने के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान के जरिए आम जनता के बीच डर फैलाने की कोशिश की थी। इन पार्टियों ने हवा बनाने के लिए उस वक्त भी इन्ही मीडिया संस्थानों की मदद ली थी। जिन्होंने एक लिखी-लिखाई कहानी की तरह पूरा नेरेटिव चलाया और ये भ्रम फैलाया कि बीजेपी आरक्षण खत्म करने वाली है।

उस वक्त जेडीयू बीजेपी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे थे और बीजेपी को हार का मुंह देखना पड़ा था। इसी तरह इस बार बिहार चुनाव में बीजेपी शाषित राज्यों में दलितों पर अत्याचार और ‘लड़कियों के साथ ऊंची जाति द्वारा बलात्कार’ के नेरेटिव को मीडिया के सहारे चलाने की कोशिशें की जा रही हैं। लेकिन ये और बात है कि ये मिडिया संस्थान और राजनीतिक दल सोशल मीडिया पर ही उपलब्ध और सबूतों के आधार पर एक्सपोस हो रहे हैं।

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