राम मंदिर के शिलान्यास से मजबूत हुआ भारत का असल धर्मनिरपेक्ष ढांचा


विशेष प्रतिनिधी 

नई दिल्ली : अयोध्या में एतिहासिक 5 अगस्त के दिन जिस वक्त रामंदिर के भूमि पूजन का कार्यक्रम संपन्न हो रहा था, ठीक उसी वक्त देश के बौद्धिक जगत में एक वर्ग विशेष इस कार्यक्रम को देश में धर्म निरपेक्षता के अंत की शुरुआत बता रहा था। इस प्रकार की ज्यादातर चर्चा सोशल मीडिया माध्यमों और ऑनलाइन वेब पोर्टल पर हो रही थी।

आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और स्वराज अभियान के अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने बकायदा एक अंग्रेजी वेबसाइट पर लेख लिख कर देश में धर्म निर्पेक्षता के अंत की न सिर्फ घोषणा की, बल्कि इसके लिए तथाकथित धर्मनिरपक्ष एंलीट्स को ही जिम्मेदार बताया।

यादव ने लिखा कि “हिन्दू राष्ट्र के समर्थकों को कश्मीर और अयोध्या में विजय का श्रेय नहीं जाता है, बल्कि वे भारत के धर्म निर्पेक्ष एलीट्स की असफलतओं के लाभार्थी हैं ”।

यादव यहीं नहीं रुके, उन्होंने अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों हो रहे भूमि पूजन के कार्यक्रम को बहुसंख्यकवाद राजनीति की जीत करार दिया। यादव ने लिखा कि “इस पूरे कार्यक्रम में कुछ नया है तो वो है ‘वैधता का ठप्पा’, 1949 और 1986 के उलट इस बार देवता सुप्रीम कोर्ट की छाप के बाद प्रवेश कर रहा है ”।

योगेंद्र यादव सहित कई और तथाकथित बौद्धिक मुनीशियों ने अलग अलग ढंग से भूमि पूजन के कार्यक्रम पर प्रतिक्रिया प्रेषित कीं।

विवादित इस्लामिक पत्रकार अरफा खान शेरवानी ने अपने एक ट्वीट में कहा कि “क्या ये वहीं देश है जिसके लिए मेरे पूर्वजों ने लड़ाइयां लड़ीं, मै अपने देश को पहचान नहीं पा रही हूं”।

पूर्व राज्यसभा सांसद और पत्रकार शाहिद सिद्दीकी ने एक ट्वीट के जरिए अपने धर्मनिर्पेक्ष लिबरल मित्रों पर कट्टाक्ष किया जो उनके मुताबिक हिन्दुत्व की लहर में बह रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि उनके यही धर्म निर्पेक्ष और लिबरल मित्र हिन्दुत्व के उसी शैतान के हाथों प्रताड़ित होंगे जिसका समर्थन कर वो उसे बढावा दे रहे हैं। सिद्दीकी ने दावा किया कि भारत अब धर्मनिर्पेक्ष देश नहीं है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट में 9 साल तक चले राममंदिर मामले की सुनवाई और फिर इसके फैसले के निष्पक्ष अवलोकन से पता चलता है, कि देश की सर्वोच्च अदालत ने अपने इस फैसले से करोड़ों लोगों की न सिर्फ भारत की न्याय व्यवस्था में, बल्कि देश की धर्मनिर्पेक्ष छवी में भी विश्वास को और मजबूत किया है।

राममंदिर के भूमिपूजन पर सवाल उठाने वाले और इसे देश की धर्मनिर्पेक्षता के अंत के रूप में प्रस्तुत करने वाले चंद तथाकथित बुद्धीजीवियों के इस व्यवहार पर गंभीर सवाल भी उठते हैं। यही नहीं उनके इस प्रकार के आचरण के पीछे की मंशा पर भी सवाल उठते हैं। आखिरकार इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब देश की धर्मनिरपक्ष छवि पर धब्बे लगे और समाज के एक बड़े वर्ग ने उसका विरोध भी किया लेकिन इसी बौद्धिक वर्ग ने उसे अनदेखा किया है।

इससे पहले 1950 में प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने हिन्दु मैरिज एक्ट लाकर हिन्दु समाज में व्याप्त बहुविवाह प्रथा से छुटकारा दिलाने और विधवाओँ के हक हुकुक सुरक्षित करने का दावा किया, लेकिन ठीक उसी वक्त मुस्लिम समाज को पर्सनल लॉ के तहत छूट देकर समान नागरिक्ता की अवधारणा को ही खत्म कर दिया था। इस अकले फैसले ने भारत के आधुनिक लोकतंत्र बनने के पूरे सपने को ही चकनाचूर कर दिया था। उस वक्त हिन्दू समाज ने तो खुद को ठगा महसूस किया ही, लेकिन वर्तमान में भी कई समस्याओँ की जड़ में नेहरू का ये कदम मुख्य है।

इसी तरह 1966 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान  गौवध के खिलाफ विरोध कर रहे सन्यासियों पर दिल्ली के संसद मार्ग में गोलियां चलाने के मामले में हिंदु समाज में अलग थलग किए जाने की भावना पैदा हुई।

1980 के दशक में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में चर्चित शाह बानों का मामला मुस्लिम तुष्टीकरण का बड़ा उदाहरण बना। इस अकेले मामले ने अगले 30 वर्षों की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक और मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति को गहराई तक रोप दिया। फलस्वरूप देश में मुस्लिम समाज में जिहादी सोच के बढ़ने, अशिक्षा और बेरोजगारी बड़ी समस्या बनकर उभरे, जबकि हिन्दू समाज ने खुद को असहाय पाया।

ये वो तमाम घटनाएं हैं जिनकी वजह से भारतीय संविधान के धर्मिनिर्पेक्ष पहलु पर गहरा आघात पहुंचा था। इन तमाम घटनाओं के मुकाबले राम मंदिर का मामला बेहद जटिल होने के बावजूद न सिर्फ न्याय संगत अपने परिणाम तक पहुंचा बल्कि इससे देश की धर्मनिर्पेक्ष छवी भी मजबूत हुई। साथ ही ये स्पष्ट भी हुआ कि न्याय पालिका धार्मिक तुष्टीकरण पर नहीं बल्कि शुद्ध साक्ष्यों और तथ्यो पर फैसले देती है।

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