छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार अर्बन नक्सलियों के पाप धोने में जुटी

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली : नक्सल आंतकियों, उनके ओवर ग्राउंड सहयोगियों यानि अर्बन नकस्लियों और कांग्रेस पार्टी के बीच संबंध को लेकर जांच होनी चाहिए। ये मांग इसलिए उठ रही है क्योंकि जब से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार आई है, नकस्लियों से जुड़े संगठनों और व्यक्तियों पर भूपेश बघेल सरकार मेहरबान हो गई है। राज्य सरकार ने कम से कम 13 से ज्यादा अर्बन नकस्लियों पर से मामले खत्म कर दिए हैं। इसका असर ये रहा कि बीते 6 अगस्त को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को नंदिनी सुंदर समेत कुल 13 अर्बन नक्सलियों को एक-एक लाख रुपए मुआवजे के रूप में देने का आदेश देना पड़ा।

छत्तीसगढ़ के जंगलों में आतंक फैलाने वाले नक्सलियों और देश की नामचीन यूनिवर्सिटी के कुछ प्रोफेसरों की सांठगांठ को लेकर कोई संदेह नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी और जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी सहित देश के कई और विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां कई प्रोफेसरों के नक्सलियों के साथ संबंध को लेकर जांच एजेंसियों की उनपर नजर रहती है। कई तो पुलिस के हत्थे चढ़ भी जाते हैं। दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जीएन साईबाबा नक्सलियों के साथ संबंधों के चलते साल 2014 से जेल में हैं। इसी प्रकार महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव मामले में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हेनी बाबू भी पुलिस के हत्थे चढ़ चुके हैं। ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठते हैं कि, जब देश की जांच एजेंसियाँ अर्बन नक्सलियों को बेपर्दा करने में जुटी हुई हैं, तो छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार इनके दामन साफ करने में क्यों लगी हुई है?

दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और उनके सहयोगियों पर 05 नंबर 2016 को तत्कालीन रमन सिंह सरकार ने एक आदिवासी की हत्या करने, आर्म एक्ट और जनसुरक्षा कानून की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया था। पूरे मामले में नंदिनी सुंदर व अर्चना प्रसाद के साथ विनीत तिवारी, संजय पराते, मंजू कवासी व मंगलराम कर्मा को आरोपी बनाया गया था।

इन पर आरोप था कि इन प्रोफेसरों ने बस्तर के ग्रामीण इलाकों में जाकर लोगों को नक्सलियों का समर्थन करने और उनका सहयोग करने की बात कही थी। साथ ही इन लोगों के लौटने के बाद उनके नक्सली साथियों ने दरभा इलाके के नामा गांव में शामनाथ बघेल नाम के आदिवासी ग्रामीण की हत्या कर दी थी। मृतक की विधवा विमला बघेल नंदिनी सुंदर और उनके दल पर उनके पति की हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया था। जिनकी शिकायत पर पुलिस ने केस दर्ज जांच शुरु कर दी थी।

आपको बता दें कि स्थानीय मीडिया में भी इस घटना की जमकर रिपोर्टिंग हुई थी। यही नहीं इन लोगों की गिरफ्तारी को लेकर किए गए स्थानीय लोगों के प्रदर्शन की भी जमकर मीडिया ने खबरे छापी थीं। लेकिन नंदिनी सुंदर ने घटना के 10 दिन के भीतर ही यानि 15 नवंबर 2016 को सुप्रीम कोर्ट में गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए याचिका दाखिल कर दी थी। जिसके बाद पूरा मामला दो साल तक ठंडे बस्ते में पड़ा रहा।

साल 2018 में छत्तीसगढ़ विधानसभा के चुनाव हुए। इन चुनाव में कांग्रेस पार्टी की जीत हुई और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। इसी के फौरन बाद गिरफ्तारी से बच रहीं नंदिनी सुंदर ने दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ पुलिस ने सुंदर और उनके साथियों के खिलाफ दर्ज एफआइआर को ही गलत बता दिया। इसके बाद 11 फरवरी 2019 में प्रदेश सरकार ने एफआइआर से नंदिनी सुंदर व उनके सहयोगियों का नाम हटा दिया।

उधर मानवाधिकार आयोग ने 2016 में इस प्रकरण को स्वत: संज्ञान में लिया था। आयोग ने तत्कालीन आईजी कल्लूरी को तलब किया लेकिन वे उपस्थित नहीं हुए। बहरहाल मानवाधिकार आयोग ने इन आरोपियों को न सिर्फ राहत दी बल्कि उन्हें मुआवजा भी दिला दिया। लेकिन यहां अर्बन नक्सलियों को राहत मिलने के पीछे उनका कांग्रेस पार्टी के साथ संबंध मुख्य वजह है। ऐसा संदेह इसलिए है क्योंकि राज्य में सरकार बदलते ही पुलिस ने या तो मामले में आरोपियों को क्लीन चिट दे दी या फिर मामला ही खत्म कर दिया।

भूपेश बघेल सरकार पर संदेह के पीछे भीमा-कोरेगाव का मामला भी है। पुणे पुलिस ने 11 अक्टूबर, 2018 को बस्तर रेंज के आईजी विवेकानंद सिन्हा को एल्गार परिषद् मामले में गिरफ्तार किये गए सुधीर ढवले, रोना विल्सन, शोमा सेन, सुरेन्द गडलिंग और महेश राउत के बैकग्राउंड जांच की मांग की थी, लेकिन छत्तीसगढ़ पुलिस ने मामले को रफादफा कर दिया। जबकि हकीकत में भीमा-कोरेगाव के आरोपी अर्बन नक्सली बस्तर सहित छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में आते जाते रहे हैं।

वहीं, नंदिनी सुंदर मामले में कांग्रेस की छत्तीसगढ़ सरकार की मेहरबानी के पीछे नंदिनी के पति और विवादास्पद वेबसाइट ‘द वायर’ के संपादक सिद्धार्थ वर्धराजन भी हो सकते हैं। द वायर की पक्षपाती पत्रकारिता के कारण सिद्धार्थ वर्धराजन और उनके सहयोगी अक्सर चर्चा का विषय बने रहते हैं। वर्धराजन की टीम में ज्यादातर ऐसे पत्रकार हैं जो यूपीए शासनकाल में या तो राज्यसभा टीवी में मोटी तनख्वाह पर नौकरी करते थे या फिर कांग्रेस समर्पित पत्रकारों के तौर पर उनकी पहचान जनता के बीच रही है।

कांग्रेस पार्टी का खुलकर अर्बन नक्सलियों के प्रति नरमी बरतना उसके केंद्रीय नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े करता है, वो भी तब जबकि साल 2013 में छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले के दरभा क्षेत्र में नक्सलियों ने घात लगाकर प्रदेश कांग्रेस पार्टी के पूरे नेतृत्व का सफाया ही कर दिया था। इस नक्सली हमले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित 30 नेताओँ की हत्या कर दी गई थी और 36 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर दिया गया था। लिहाजा कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को बताना होगा कि आखिर उनकी और अर्बन नक्सलियों के बीच ऐसी क्या डील हुई है, जो उन्होंने अपनी ही पार्टी के नेताओं के कातिलों को बचाना और उन्हें संरक्षण देना शुरु कर दिया है?

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