बिहार चुनाव के लिए आखिरकार कांग्रेस ने अपना ढोंगी मुखौटा उतार फेंक दिया

विशेष संवाददाता

नई दिल्ली: संविधान को लगातार खतरे में बता कर खुद को न्याय और भाईचारे की प्रतिमूर्ती बताने वाली कांग्रेस पार्टी ने बिहार में आते आते ढोंग का चोला उतार फेंका है और उसी क्रूर और सामंती चेहरे को जनता के सामने पेश किया है जिसके सहारे कांग्रेस दशकों तक भारत का भाग्य विधाता बनी रही। कांग्रेस ने आज़ादी के बाद से मुग़लों और अंग्रेजों की फूट डालो राज करों की नीति को बेहद सटीकता से आज़माया है।

सामंतों की तरह राज करते हुए कांग्रेस ने देश के तमाम प्रतिष्ठानों में अपने चहेतों और चमचों को बैठाया ताकि ज़मीन से उठने वाली विरोध की आवाज़ दबी रहे। यही वजह है कि कांग्रेस राज में सबसे ज्यादा सांप्रदायिक दंगे हुए, लेकिन उस पर कभी दंगाई पार्टी होने का ठप्पा नहीं लग सका। यही नहीं गांधी परिवार के राज में देश में दशकों तक महिलाओँ और बालिकाओं के साथ हैवानियत होती रही, लेकिन इस परिवार पर कभी महिला विरोधी होने का ठप्पा नहीं लग सका।

बिहार चुनाव हमेशा से जातिवाद और अपराधिकरण के लिए जाना जाता रहा है। ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जो बिहार में जाति के आधार पर अपने प्रत्याशियों को टिकट नहीं देता हो या बाहुबलियों को प्राथमिक्ता नहीं देता हो। बीजेपी या जेडीयू भले कितना ही राजनीति के आपराधिकरण के खिलाफ आवाज़ उठाते हों, ये भी अपराधियों के परिजनों को टिकट देकर सीधे नहीं लेकिन पर्दे के पीछे से तवज्जो देते रहे हैं।

लेकिन कांग्रेस इन सब राजनीतिक दलों बेहद आगे बढ़ गई है। शायद राजनीतिक और नैतिक रूप से ठीक दिखने की लाज भी कांग्रेस को अब जरूरी नहीं लगती। इसीलिए पहले तो पार्टी ने बिहार में देश के बंटवारे और हिन्दू-मुस्लिम भेद के जनक जिन्ना के समर्थक को टिकट दिया था और अब बलात्कार के आरोपी प्रवीण सिंह कुशवाहा को टिकट दिया है।

प्रवीण सिंह कुशवाहा 1988 के कुख्यात पापरी बोस रेप कांड में मुख्य आरोपी हैं। पापरी रेप कांड ने ही बिहार में कांग्रेस के पतन की शुरुआत की थी। यही नहीं यह कांड देश के इतिहास में कांग्रेसी सत्ता की आपराधिक तानाशाही की एक ऐसी मिसाल है, जिसे बार बार याद किया जाना चाहिए। प्रवीण सिंह उस वक्त कांग्रेस के संगठन एनएसयूआई का भागलपुर जिला अध्यक्ष था।

उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक प्रवीण ने एक डॉक्टर की बेटी का अपहरण कर उसका बलात्कार किया, लेकिन मामले में आम जनता के बढ़ते आक्रोश के बाद प्रवीण ने अगले दिन लड़की से शादी का दावा किया और एक तस्वीर जारी कर इसे सही साबित करने की कोशिश भी की। पीड़ित पापरी बोस को जिस ओंकारनाथ राम इंजीनियर के घर में छिपाकर रखा गया था, वह तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री भगवत झा आजाद के करीबी थे। रेप कांड में आजाद के एक करीबी रिश्तेदार के साथ ही उनके बेटे कीर्ति झा आजाद का भी नाम सामने आया था।

ये समझना जरूरी है कि 1988 में ना तो मोबाइल था और ना ही सैटेलइट न्यूज चैनल्स और इंटरनेट ही था, लिहाजा सीमित समाचार पत्रों के जमान में सत्ताधारी पार्टी के नेताओं की हनक का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। मामले में जमकर सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया। पुलिस ने प्रवीण सिंह को ना सिर्फ भागने में मदद की बल्कि पीड़ित लड़की और उसके परिजनों पर जमकर दबाव बनाया था। इस घटना पर आम जनता के बीच इतना रोष था कि कई दिनों तक भागलपुर सहित राज्य के कई जिले बंद रहे।

कांग्रेस पार्टी यूपी के हाथरस कांड में मृतका को न्याय दिलाने का ढोंग करती है, लेकिन खुद बिहार में बलात्कार के कुख्यात आरोपी को टिकट देती है। आपको बता दें कि कांग्रेस ने आरोपी नेता प्रवीण सिंह को 2005 में भी विधानसभा का प्रत्याशी बनाया था। वहीं मध्य प्रदेश में दलित महिला को आइटम कहने वाले कमलनाथ के खिलाफ गांधी परिवार के किसी भी सदस्य ने अबतक एक शब्द नहीं कहा है। जाहिर है कि दलित और महिला तो सिर्फ गांधी परिवार की घृणित राजनीति के साधन भर हैं और उनके लिए सिर्फ गांधी परिवार का कुल और उनकी महिलाएँ ही सम्मान की हकदार हैं।

इससे पहले जिन्ना के समर्थक मश्कूर उस्मानी को कांग्रेस ने जाले विधानसभा से अपना प्रत्याशी बनाया था। जिसे लेकर अब भी खूब विवाद हो रहा है। बिहार के कांग्रेस नेताओं ने ही इसका विरोध शुरू किया था। मशकूर अहमद उस्मानी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्‍वविद्यालय छात्र-संघ का अध्‍यक्ष रहते हुए साल 2018 में विश्‍वविद्यालय में लगी मोहम्‍मद अली जिन्‍ना की तस्‍वीर हटाने का विरोध किया था।

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